अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।।
मूल पाठ
राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।।
बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती।।
स्रोत अभिलेख 2.316 · पुस्तक पृ. 608, 609
भावार्थ
मूल पाठ के बादराजधर्मका सर्वस्व (सार) भी इतना ही है। जैसे मनके भीतर मनोरथ छिपा रहता है। श्रीरघुनाथजीने भाई भरतको बहुत प्रकारसे समझाया। परन्तु कोई अवलम्बन पाये बिना उनके मनमें न सन्तोष हुआ, न शान्ति॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 608 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।।
English explanation
AI draft interpretation: The essence of royal duty is just this—to keep one’s personal wish concealed within the mind.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राजधरम | राजा का धर्म और कर्तव्य | a king’s duty |
| सरबसु | सारा सार | the entire essence |
| एतनोई | इतना ही | just this much |
| जिमि | जैसे | as; just as |
| मन | मन | the mind |
| माहँ | में | within |
| मनोरथ | अपनी अभिलाषा | one’s cherished wish |
| गोई | छिपाकर रखे | keeps concealed |
2 बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती।।
English explanation
Rama reassured his brother Bharata in many ways, but without some support Bharata’s mind found neither satisfaction nor peace.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बंधु | भाई भरत को | his brother Bharata |
| प्रबोधु | समझाना; सांत्वना | reassurance; counsel |
| कीन्ह | किया | gave; performed |
| बहु | अनेक | many |
| भाँती | प्रकारों से | in ways |
| बिनु | बिना | without |
| अधार | सहारा | support |
| मन | मन में | in the mind |
| तोषु | संतोष | contentment |
| न | नहीं | not |
| साँती | शांति | peace |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.316
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 608
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद,पादुका-प्रदान, भरतजीकी विदाई
- मुद्रित पृष्ठ
- 608, 609
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।