अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई।।
मूल पाठ
मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई।।
रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू।।
स्रोत अभिलेख 2.24 · पुस्तक पृ. 543, 544
भावार्थ
मूल पाठ के बादन तो [क्षणभरके लिये भी सेवासे पृथक् होकर] मिलते ही बनता है और न [प्रेमवश] छोड़ते (उपेक्षा करते) ही। कोई श्रेष्ठ कवि ही लक्ष्मणजीके चित्तकी इस गति (दुविधा) का वर्णन कर सकता है। वे सेवापर भार रखकर रह गये (सेवाको ही विशेष महत्त्वपूर्ण समझकर उसीमें लगे रहे) मानो चढ़ी हुई पतंगको खिलाड़ी (पतंग उड़ानेवाला) खींच रहा हो॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 543 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई।।
English explanation
Lakshmana could neither go to meet Bharata nor bear remaining where he was. The skilled poet describes this state of his mind.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मिलि | मिलने | to meet |
| न | नहीं | not |
| जाइ | जा सकते | could go |
| नहिं | नहीं | not |
| गुदरत | ठहरे रहना, समय काटना | remaining there; passing the time |
| बनई | बन पड़ता था | was possible |
| सुकबि | कुशल कवि | the skilled poet |
| लखन | लक्ष्मण के | Lakshmana’s |
| मन | मन | mind |
| की | की | of |
| गति | दशा | state |
| भनई | कहता है | describes |
2 रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू।।
English explanation
Giving greater weight to service, Lakshmana remained there, like a soaring kite held back by its flyer’s pull on the string.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रहे | रुके रहे | remained |
| राखि | रखकर | placing |
| सेवा | सेवा | service |
| पर | पर | on |
| भारू | अधिक भार या महत्त्व | greater weight or priority |
| चढ़ी | ऊपर उड़ती हुई | soaring |
| चंग | पतंग | kite |
| जनु | मानो | as though |
| खैंच | डोर खींचकर | pulling its string |
| खेलारू | पतंग उड़ाने वाला | the kite flyer |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.24
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 543
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 543, 544
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।