अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं।।
मूल पाठ
भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं।।
रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती।।
स्रोत अभिलेख 2.7 · पुस्तक पृ. 349, 349
भावार्थ
मूल पाठ के बादऔर भरतके समान जगत्में [हमें] कौन प्यारा है! शकुनका बस, यही फल है, दूसरा नहीं। श्रीरामचन्द्रजीको [अपने] भाई भरतका दिन-रात ऐसा सोच रहता है जैसा कछुएका हृदय अंडोंमें रहता है॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 349 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं।।
English explanation
‘Who in the world is as dear as Bharata? This alone is what these omens foretell, and nothing else.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरत | भरत के | Bharata |
| सरिस | समान | as … as |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| को | कौन | who |
| जग | संसार | the world |
| माहीं | में | in |
| इहइ | यही | this alone |
| सगुन | शकुनों का | of the omens |
| फलु | फल, संकेतित परिणाम | result foretold |
| दूसर | दूसरा | any other |
| नाहीं | नहीं | not |
2 रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती।।
English explanation
Rama thinks of his brother day and night, just as a tortoise’s heart remains intent upon its eggs.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रामहि | राम को | to Rama |
| बंधु | भाई का | of his brother |
| सोच | चिंता, निरंतर ध्यान | concern, constant thought |
| दिन | दिन | day |
| राती | रात | night |
| अंडन्हि | अंडों में | upon the eggs |
| कमठ | कछुए का | a tortoise’s |
| ह्रदउ | हृदय, मन | heart, mind |
| जेहि | जिस | in which |
| भाँती | प्रकार | manner |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.7
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 349
- सहायक विषय
- रामराज्याभिषेककी तैयारी, देवताओंकी व्याकुलता तथा सरस्वतीजीसे उनकी प्रार्थना
- मुद्रित पृष्ठ
- 349, 349
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।