अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे।।
मूल पाठ
भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे।।
तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ।।
स्रोत अभिलेख 2.292 · पुस्तक पृ. 587, 588
भावार्थ
मूल पाठ के बादभरतजीने आकर उन्हें आगे होकर लिया (सामने आकर उनका स्वागत किया) और समयानुकूल अच्छे आसन दिये। तिरहुतराज जनकजी कहने लगे—हे तात भरत! तुमको श्रीरामजीका स्वभाव मालूम ही है॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 588 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे।।
English explanation
Bharata came forward to receive them and provided suitable seats for the occasion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरत | भरत | Bharata |
| आइ | आकर | having come |
| आगें | आगे | forward |
| भइ | भेंट; मिलना | meeting; reception |
| लीन्हे | कर लिया; स्वागत किया | received them |
| अवसर | अवसर के | the occasion |
| सरिस | अनुरूप | appropriate to |
| सुआसन | अच्छे आसन | good seats |
| दीन्हे | दिए | provided |
2 तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ।।
English explanation
Janaka, king of Tirhut, said: Dear Bharata, you know Rama’s nature.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तात | प्रिय पुत्र | dear son |
| भरत | भरत | Bharata |
| कह | कहते हैं | says |
| तेरहुति | तिरहुत के | of Tirhut |
| राऊ | राजा जनक | King Janaka |
| तुम्हहि | तुम्हें | to you |
| बिदित | ज्ञात | known |
| रघुबीर | रघुकुल के वीर राम का | of Rama, hero of Raghu’s lineage |
| सुभाऊ | स्वभाव | nature |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.292
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 588
- सहायक विषय
- जनक-वसिष्ठादि-संवाद, इन्द्रकी चिन्ता, सरस्वतीका इन्द्रको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 587, 588
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।