अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्ददेवताओंकी विनती सुनकर और देवताओंको स्वार्थके वश होनेसे मूर्ख जानकर बुद्धिमती सरस्वतीजी बोलीं—मुझसे कह रहे हो कि भरतजीकी मति पलट दो! हजार नेत्रोंसे भी तुमको सुमेरु नहीं सूझ पड़ता!॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 590 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी।।
मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू।।
स्रोत अभिलेख 2.295 · पुस्तक पृ. 590, 591
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी।।
English explanation
Hearing the gods’ plea, the discerning goddess spoke, recognizing them as senseless through self-interest.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिबुध | देवताओं की | the gods’ |
| बिनय | विनती | plea |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| देबि | देवी सरस्वती | Goddess Saraswati |
| सयानी | समझदार | discerning |
| बोली | बोलीं | spoke |
| सुर | देवताओं को | the gods |
| स्वारथ | स्वार्थ के कारण | through self-interest |
| जड़ | विवेकहीन | senseless |
| जानी | जानकर | recognizing as |
2 मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू।।
English explanation
You ask me to turn Bharata’s mind! Even with a thousand eyes, you cannot see Mount Sumeru.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मो | मुझ | me |
| सन | से | to |
| कहहु | तुम कहते हो | you say |
| भरत | भरत की | Bharata’s |
| मति | बुद्धि | mind |
| फेरू | मैं फेर दूँ | I should turn aside |
| लोचन | आँखें | eyes |
| सहस | हजार | a thousand |
| न | नहीं | not |
| सूझ | दिखता | can see |
| सुमेरू | सुमेरु पर्वत | Mount Sumeru |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.295
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 590
- सहायक विषय
- जनक-वसिष्ठादि-संवाद, इन्द्रकी चिन्ता, सरस्वतीका इन्द्रको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 590, 591
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