अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा।।
मूल पाठ
बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा।।
कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत।।
स्रोत अभिलेख 2.239 · पुस्तक पृ. 542, 543
भावार्थ
मूल पाठ के बादश्रीरामजीके वल्कल वस्त्र हैं, जटा धारण किये हैं, श्याम शरीर है [सीतारामजी ऐसे लगते हैं] मानो रति और कामदेवने मुनिका वेष धारण किया हो। श्रीरामजी अपने करकमलोंसे धनुष-बाण फेर रहे हैं, और हँसकर देखते ही जीकी जलन हर लेते हैं (अर्थात् जिसकी ओर भी एक बार हँसकर देख लेते हैं, उसीको परम आनन्द और शान्ति मिल जाती है।)॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 543 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा।।
English explanation
Rama wore bark garments, had matted locks and a dark-hued body; Sita and Rama looked as though Rati and the god of love had assumed ascetic dress.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बलकल | वृक्ष की छाल के | made of tree bark |
| बसन | वस्त्र | garments |
| जटिल | जटाधारी | with matted locks |
| तनु | शरीर | body |
| स्यामा | श्याम वर्ण का | dark-hued |
| जनु | मानो | as though |
| मुनि | मुनियों का | of ascetics |
| बेष | वेश | dress |
| कीन्ह | धारण किया | had assumed |
| रति | रति, कामदेव की पत्नी | Rati, the wife of the god of love |
| कामा | कामदेव | the god of love |
2 कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत।।
English explanation
Rama turned the bow and arrow in his lotus-like hands; his smiling glances relieved the heart’s burning anguish.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कर | हाथों के | hands |
| कमलनि | कमलों में | in their lotus-like form |
| धनु | धनुष | bow |
| सायकु | बाण | arrow |
| फेरत | फेरते हुए | turning about |
| जिय | हृदय | heart |
| की | की | of |
| जरनि | जलन; संताप | burning anguish |
| हरत | दूर करते हुए | relieving |
| हँसि | मुस्कराकर | smiling |
| हेरत | देखते हुए | gazing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.239
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 543
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 542, 543
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।