अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू।।
मूल पाठ
बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू।।
करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए।।
स्रोत अभिलेख 2.134 · पुस्तक पृ. 455, 456
भावार्थ
मूल पाठ के बादफूलोंकी वर्षा करके देवसमाजने कहा—हे नाथ! आज [आपका दर्शन पाकर] हम सनाथ हो गये। फिर विनती करके उन्होंने अपने दु:सह दु:ख सुनाये और [दु:खोंके नाशका आश्वासन पाकर] हॢषत होकर अपने-अपने स्थानोंको चले गये॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 455 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू।।
English explanation
Showering flowers, the assembly of gods said, “O Lord, today we have found our protector in you.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बरषि | बरसाकर | having showered |
| सुमन | फूल | flowers |
| कह | कहता है | says |
| देव | देवताओं का | of gods |
| समाजू | समुदाय | assembly |
| नाथ | हे स्वामी | O Lord |
| सनाथ | स्वामी और रक्षक से युक्त | having a lord and protector |
| भए | हो गए | have become |
| हम | हम | we |
| आजू | आज | today |
2 करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए।।
English explanation
They made their supplication, related their unbearable sorrows, and departed joyfully for their respective abodes.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करि | करके | having made |
| बिनती | विनती | a supplication |
| दुख | दुःख | sorrows |
| दुसह | असहनीय | unbearable |
| सुनाए | बताए | recounted |
| हरषित | प्रसन्न होकर | joyfully |
| निज | अपने | their own |
| निज | अपने-अपने | respective |
| सदन | निवासों को | to their abodes |
| सिधाए | चले गए | departed |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.134
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 455
- सहायक विषय
- चित्रकूटमें निवास, कोल-भीलोंके द्वारा सेवा
- मुद्रित पृष्ठ
- 455, 456
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।