अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू।।
मूल पाठ
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू।।
रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा।।
स्रोत अभिलेख 2.243 · पुस्तक पृ. 546, 546
भावार्थ
मूल पाठ के बादफिर प्रेमसे पुलकित होकर केवट (निषादराज) ने अपना नाम लेकर दूरसे ही वसिष्ठजीको दण्डवत् प्रणाम किया। ऋषि वसिष्ठजीने रामसखा जानकर उसको जबर्दस्ती हृदयसे लगा लिया। मानो जमीनपर लोटते हुए प्रेमको समेट लिया हो॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 546 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू।।
English explanation
Thrilled with affection, the Nishada chief announced his name and prostrated from a distance.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रेम | प्रेम से | with affection |
| पुलकि | रोमांचित होकर | with his hair standing on end |
| केवट | निषादराज गुह | Guha, the Nishada chief |
| कहि | बताकर | having stated |
| नामू | अपना नाम | his name |
| कीन्ह | किया | performed |
| दूरि | दूर | a distance |
| तें | से | from |
| दंड | दंडवत; पूरा शरीर भूमि पर रखकर | full-length upon the ground |
| प्रनामू | प्रणाम | reverential obeisance |
2 रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा।।
English explanation
The sage embraced Rama’s friend with an irresistible impulse, as though gathering up affection itself as it rolled upon the earth.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रामसखा | राम के मित्र गुह को | Guha, Rama’s friend |
| रिषि | ऋषि वसिष्ठ ने | the sage Vasishtha |
| बरबस | प्रबल सहज आवेग से | with an irresistible spontaneous impulse |
| भेंटा | गले लगाया | embraced |
| जनु | मानो | as though |
| महि | धरती पर | upon the earth |
| लुठत | लोटते हुए | rolling |
| सनेह | प्रेम को | affection itself |
| समेटा | समेट लिया | gathered up |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.243
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 546
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 546, 546
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।