अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दउनका प्रेम और महान् आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो कंगालने कुबेरका पद पा लिया हो। बड़े आदरके साथ सुन्दर मुख देखकर माता मधुर वचन बोलीं—॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 387 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई।।
सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी।।
स्रोत अभिलेख 2.52 · पुस्तक पृ. 387, 387
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई।।
English explanation
Her love and delight are beyond description, as though a pauper had attained the station of Kubera.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रेमु | प्रेम | love |
| प्रमोदु | अत्यंत आनंद | great delight |
| न | नहीं | not |
| कछु | कुछ भी | anything at all |
| कहि | कहा | expressed |
| जाई | जा सकता | can be |
| रंक | निर्धन व्यक्ति | a pauper |
| धनद | धन के देवता कुबेर का | of Kubera, god of wealth |
| पदबी | पद; प्रतिष्ठा | station; rank |
| जनु | मानो | as though |
| पाई | प्राप्त की हो | had attained |
2 सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी।।
English explanation
Gazing respectfully at his beautiful face, his mother spoke sweet words.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सादर | आदरपूर्वक | with respect |
| सुंदर | सुंदर | beautiful |
| बदनु | मुख | face |
| निहारी | निहारकर | having gazed at |
| बोली | बोलीं | spoke |
| मधुर | मधुर | sweet |
| बचन | वचन | words |
| महतारी | माता | his mother |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.52
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 387
- सहायक विषय
- श्रीराम-कौसल्या-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 387, 387
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।