अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहे पुत्र! तुम सभीके परम प्रिय हो। प्राणोंके प्राण और हृदयके जीवन हो। वही (प्राणाधार) तुम कहते हो कि माता! मैं वनको जाऊँ और मैं तुम्हारे वचनोंको सुनकर बैठी पछताती हूँ!॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 390 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के।।
ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ।।
स्रोत अभिलेख 2.56 · पुस्तक पृ. 390, 391
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के।।
English explanation
Son, you are supremely dear to everyone—the very life of their vital breath and the life of their souls.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पूत | हे पुत्र | son |
| परम | अत्यंत | supremely |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| तुम्ह | तुम | you |
| सबही | सभी | everyone |
| के | को | to |
| प्रान | प्राणस्वरूप | the very life |
| प्रान | प्राणों | of vital breath |
| के | के | of |
| जीवन | जीवन | the life |
| जी | जीव के | the soul |
| के | के | of |
2 ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ।।
English explanation
Yet you, that very beloved son, say, 'Mother, let me go to the forest,' while I sit grieving upon hearing your words.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ते | वही | that very |
| तुम्ह | तुम | you |
| कहहु | कहते हो | say |
| मातु | हे माता | Mother |
| बन | वन में | to the forest |
| जाऊँ | मैं जाऊँ | let me go |
| मैं | मैं | I |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| बचन | तुम्हारे वचन | your words |
| बैठि | बैठकर | sitting |
| पछिताऊँ | पछताती रहूँ | remain grieving |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.56
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 390
- सहायक विषय
- श्रीराम-कौसल्या-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 390, 391
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।