अयोध्याकाण्ड · दोहा 56 · दोहा/सोरठा
यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ।
यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ।
मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ।।56।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.56 · पुस्तक पृ. 390, 391
भावार्थ और शब्दार्थ
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1यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ।
यह सोचकर मैं मिथ्या मोह बढ़ाकर हठ नहीं करती।
English explanation
Considering this, I do not insist by indulging misplaced attachment.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| यह | यह | this |
| बिचारि | विचारकर | considering |
| नहिं | नहीं | not |
| करउँ | मैं करती हूँ | I make |
| हठ | हठ | an obstinate insistence |
| झूठ | मिथ्या | misplaced |
| सनेहु | मोह या स्नेह | attachment |
| बढ़ाइ | बढ़ाकर | by increasing |
2 मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ।।56।।
माता का नाता मानकर मेरी याद भूल न जाना; मैं तुम पर बलिहारी हूँ।
English explanation
Honor your bond with your mother and do not forget me; I offer myself to you in love.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मानि | मानकर | honoring |
| मातु | माता | mother |
| कर | का | with |
| नात | नाता | the bond |
| बलि | मैं बलिहारी हूँ | I offer myself to you in love |
| सुरति | मेरी याद | the remembrance of me |
| बिसरि | भूल | be forgotten |
| जनि | न | not |
| जाइ | जाए | let it become |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 56
- स्रोत अभिलेख
- 2.56
- सहायक विषय
- श्रीराम-कौसल्या-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 390, 391
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।