अयोध्याकाण्ड · दोहा 55 · दोहा/सोरठा
राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु।
राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु।
तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु।।55।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.55 · पुस्तक पृ. 389, 390
भावार्थ और शब्दार्थ
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1राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु।
राज्य देने को कहकर वन दे दिया—मुझे उस बात का लेशमात्र भी दुःख नहीं है।
English explanation
Having promised you the kingdom, he gave you the forest instead—I feel not the slightest sorrow over that.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राजु | राज्य | the kingdom |
| देन | देने को | to give |
| कहि | कहकर | having said; having promised |
| दीन्ह | दे दिया | gave |
| बनु | वन; वनवास | the forest; forest exile |
| मोहि | मुझे | to me |
| न | नहीं | not |
| सो | उस बात का | over that |
| दुख | दुःख | sorrow |
| लेसु | लेशमात्र | the slightest trace |
2 तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु।।55।।
परंतु तुम्हारे बिना भरत, राजा दशरथ और प्रजा को अत्यंत कष्ट होगा।
English explanation
But without you, Bharata, King Dasharatha, and the people will suffer intense distress.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुम्ह | तुम्हारे | you |
| बिनु | बिना | without |
| भरतहि | भरत को | to Bharata |
| भूपतिहि | राजा दशरथ को | to King Dasharatha |
| प्रजहि | प्रजा को | to the people |
| प्रचंड | अत्यंत तीव्र | intense |
| कलेसु | कष्ट; क्लेश | distress; suffering |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 55
- स्रोत अभिलेख
- 2.55
- सहायक विषय
- श्रीराम-कौसल्या-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 389, 390
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