अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दमैंने पिताजीके ऐश्वर्यकी छटा देखी है, जिनके चरण रखनेकी चौकीसे सर्वशिरोमणि राजाओंके मुकुट मिलते हैं (अर्थात् बड़े-बड़े राजा जिनके चरणोंमें प्रणाम करते हैं) ऐसे पिताका घर भी, जो सब प्रकारके सुखोंका भण्डार है, पतिके बिना मेरे मनको भूलकर भी नहीं भाता॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 424 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा।।
सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें।।
स्रोत अभिलेख 2.98 · पुस्तक पृ. 424, 425
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा।।
English explanation
AI-draft meaning: I have seen my father’s wealth and splendid way of life; kings’ jewel-studded crowns touch his footstool.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पितु | पिता का | my father’s |
| बैभव | वैभव; समृद्धि | wealth and grandeur |
| बिलास | ऐश्वर्यपूर्ण सुख-विलास | splendid enjoyments |
| मैं | मैंने | I |
| डीठा | देखा है | have seen |
| नृप | राजाओं के | of kings |
| मनि | रत्न; मणियाँ | jewels |
| मुकुट | मुकुट | crowns |
| मिलित | स्पर्श करते हुए; मिले हुए | touching; in contact with |
| पद | चरणों की | for the feet |
| पीठा | चौकी | footstool |
2 सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें।।
English explanation
Even my father’s home, such a treasury of comforts, does not please me in the slightest without my beloved husband.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुखनिधान | सुखों का भंडार | a treasury of comforts |
| अस | ऐसा | such |
| पितु | पिता का | my father’s |
| गृह | घर | home |
| मोरें | मेरा; मेरे यहाँ का | my; belonging to me |
| पिय | प्रिय पति | beloved husband |
| बिहीन | के बिना | without |
| मन | मन को | to my heart |
| भाव | भाता है | is pleasing |
| न | नहीं | not |
| भोरें | तनिक भी | even in the slightest |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.98
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 424
- सहायक विषय
- लक्ष्मण-निषाद-संवाद, श्रीराम-सीतासे सुमन्त्रका संवाद, सुमन्त्रका लौटना
- मुद्रित पृष्ठ
- 424, 425
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।