अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दस्वामीका प्रेम अपने प्रति नित्य बढ़ता हुआ देखकर सीताजी ऐसी हॢषत रहती हैं जैसे दिनमें चकवी! सीताजीका मन श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें अनुरक्त है इससे उनको वन हजारों अवधके समान प्रिय लगता है॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 460 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी।।
सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा।।
स्रोत अभिलेख 2.14 · पुस्तक पृ. 460, 460
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी।।
English explanation
Seeing her husband’s love grow daily, Sita remains joyful, like a female chakravaka bird in the daytime.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाह | पति का | her husband’s |
| नेहु | प्रेम | love |
| नित | प्रतिदिन | daily |
| बढ़त | बढ़ता हुआ | growing |
| बिलोकी | देखकर | seeing |
| हरषित | प्रसन्न | joyful |
| रहति | रहती हैं | remains |
| दिवस | दिन में | in the daytime |
| जिमि | जैसे | like |
| कोकी | चकवी | a female chakravaka bird |
2 सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा।।
English explanation
Sita’s heart is devoted to Rama’s feet; the forest seemed as dear to her as a thousand Ayodhyas.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सिय | सीता का | Sita’s |
| मनु | मन | heart |
| राम | राम के | Rama’s |
| चरन | चरणों में | at the feet |
| अनुरागा | प्रेम में अनुरक्त हुआ | became lovingly devoted |
| अवध | अयोध्याएँ | Ayodhyas |
| सहस | हजार | a thousand |
| सम | के समान | equal to |
| बनु | वन | the forest |
| प्रिय | प्यारा | dear |
| लागा | लगा | seemed |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.14
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 460
- सहायक विषय
- चित्रकूटमें निवास, कोल-भीलोंके द्वारा सेवा
- मुद्रित पृष्ठ
- 460, 460
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।