अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहे नाथ! मैंने स्वामी और समाजके संकोचको छोड़कर अविनय या विनयभरी जैसी रुचि हुई वैसी ही वाणी कहकर सर्वथा ढिठाई की है। हे देव! मेरे आर्तभाव (आतुरता) को जानकर आप क्षमा करेंगे॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 595 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई।।
अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी।।
स्रोत अभिलेख 2.3 · पुस्तक पृ. 594, 595
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई।।
English explanation
O lord, I have been exceedingly presumptuous, setting aside restraint before my master and the assembly.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाथ | हे स्वामी | O lord |
| निपट | अत्यंत | exceedingly |
| मैं | मैंने | I |
| कीन्हि | की है | have committed |
| ढिठाई | धृष्टता | presumption |
| स्वामि | स्वामी के सामने | before my master |
| समाज | सभा के सामने | before the assembly |
| सकोच | संकोच; मर्यादित झिझक | restraint; respectful hesitation |
| बिहाई | छोड़कर | having cast aside |
2 अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी।।
English explanation
Whether my words seem discourteous or humble to you, O lord, forgive them, recognizing my deep distress.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अबिनय | अविनय; अशिष्टता | discourtesy |
| बिनय | विनय; नम्र निवेदन | humility; respectful appeal |
| जथारुचि | जैसी आपकी रुचि में लगे | as it seems to you |
| बानी | मेरी वाणी | my words |
| छमिहि | क्षमा कीजिए | please forgive |
| देउ | हे देव; हे प्रभु | O revered lord |
| अति | अत्यधिक | deep |
| आरति | व्याकुलता; पीड़ा | distress; anguish |
| जानी | जानकर | recognizing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.3
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 595
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 594, 595
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।