अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं।।
मूल पाठ
नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं।।
लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी।।
स्रोत अभिलेख 2.63 · पुस्तक पृ. 395, 396
भावार्थ
मूल पाठ के बादमनुष्योंको खानेवाले निशाचर (राक्षस) फिरते रहते हैं। वे करोड़ों प्रकारके कपट-रूप धारण कर लेते हैं। पहाड़का पानी बहुत ही लगता है। वनकी विपत्ति बखानी नहीं जा सकती॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 395 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं।।
English explanation
Demons who feed on humans roam about and assume countless deceptive disguises.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नर | मनुष्य | humans |
| अहार | भोजन; यहाँ मनुष्य जिनका भोजन हैं | food; here, humans as their food |
| रजनीचर | रात्रि में विचरने वाले राक्षस | night-roaming demons |
| चरहीं | घूमते हैं | roam about |
| कपट | छलपूर्ण | deceptive |
| बेष | वेश, रूप | disguises, appearances |
| बिधि | प्रकार | kinds |
| कोटिक | करोड़ों; असंख्य | millions; countless |
| करहीं | बनाते हैं | assume or create |
2 लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी।।
English explanation
Mountain water is very harmful; the hardships of the forest cannot be fully described.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लागइ | हानि करता है, प्रतिकूल पड़ता है | has a harmful effect |
| अति | बहुत | very much |
| पहार | पहाड़ | the mountain |
| कर | का | of |
| पानी | पानी | water |
| बिपिन | वन की | of the forest |
| बिपति | विपत्ति, कष्ट | hardship, danger |
| नहिं | नहीं | not |
| जाइ | जा सकती | can be |
| बखानी | वर्णित की | described |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.63
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 395
- सहायक विषय
- श्रीसीता-राम-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 395, 396
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।