अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू।।
मूल पाठ
धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू।।
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं।।
स्रोत अभिलेख 2.92 · पुस्तक पृ. 419, 420
भावार्थ
मूल पाठ के बादधरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँतक व्यवहार हैं जो देखने, सुनने और मनके अंदर विचारनेमें आते हैं, इन सबका मूल मोह (अज्ञान) ही है। परमार्थत: ये नहीं हैं॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 420 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू।।
English explanation
Land, home, wealth, city, family, heaven, and hell—all that worldly dealings encompass belong to this same sphere.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| धरनि | भूमि | land |
| धामु | घर | home |
| धनु | धन | wealth |
| पुर | नगर | city |
| परिवारू | परिवार | family |
| सरगु | स्वर्ग | heaven |
| नरकु | नरक | hell |
| जहँ | जहाँ तक | as far as |
| लगि | तक | up to |
| ब्यवहारू | लौकिक व्यवहार | worldly dealings |
2 देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं।।
English explanation
Whatever is seen, heard, or contemplated in the mind is rooted in delusion; it is not ultimate reality.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देखिअ | देखा जाता है | is seen |
| सुनिअ | सुना जाता है | is heard |
| गुनिअ | विचार किया जाता है | is contemplated |
| मन | मन | the mind |
| माहीं | में | within |
| मोह | मोह | delusion |
| मूल | मूल है | is the root |
| परमारथु | परम सत्य | ultimate reality |
| नाहीं | नहीं है | is not |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.92
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 420
- सहायक विषय
- लक्ष्मण-निषाद-संवाद, श्रीराम-सीतासे सुमन्त्रका संवाद, सुमन्त्रका लौटना
- मुद्रित पृष्ठ
- 419, 420
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।