अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दआप पंच (सब) लोग भी इसीमें मेरा कल्याण मानकर सुन्दर वाणीसे आज्ञा और आशीर्वाद दीजिये, जिसमें मेरी विनती सुनकर और मुझे अपना दास जानकर श्रीरामचन्द्रजी राजधानीको लौट आवें॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 495 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी।।
जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी।।
स्रोत अभिलेख 2.183 · पुस्तक पृ. 495, 495
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी।।
English explanation
If you assembled counselors consider this good for me, give me permission and blessings in gracious words,
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुम्ह | आप | you |
| पै | यदि सचमुच | if indeed |
| पाँच | पंचजन; सभा के मान्य जन | assembled elders or counselors |
| मोर | मेरा | my; for me |
| भल | भला; हित | good; welfare |
| मानी | मानकर | considering |
| आयसु | आज्ञा; अनुमति | permission |
| आसिष | आशीर्वाद | blessings |
| देहु | दीजिए | please give |
| सुबानी | शुभ वाणी से | with gracious words |
2 जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी।।
English explanation
So that Rama, hearing my plea and recognizing me as his servant, may return to the capital.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जेहिं | जिससे | so that; through which |
| सुनि | सुनकर | hearing |
| बिनय | विनती | plea |
| मोहि | मुझे | me |
| जनु | अपना सेवक | his servant |
| जानी | जानकर | recognizing as |
| आवहिं | वे आएँ | may he come |
| बहुरि | फिर; लौटकर | again; back |
| रामु | राम | Rama |
| रजधानी | राजधानी अयोध्या में | to the capital, Ayodhya |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.183
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 495
- सहायक विषय
- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 495, 495
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