अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्द[और कहा—] हे तात! कृपा करके वही कीजिये जिससे अयोध्या अनाथ न हो। श्रीरामजीने मन्त्रीको उठाकर धैर्य बँधाते हुए समझाया कि हे तात! आपने तो धर्मके सभी सिद्धान्तोंको छान डाला है॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 422 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई।।
मंत्रहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा।।
स्रोत अभिलेख 2.95 · पुस्तक पृ. 422, 422
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई।।
English explanation
Dear sir, kindly do what will keep Ayodhya from becoming bereft of its protector.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तात | हे तात; आदरणीय संबोधन | dear sir; a respectful address |
| कृपा | दयालुता | kindness |
| करि | करके | having shown |
| कीजिअ | कीजिए | please do |
| सोई | वही कार्य | that very thing |
| जातें | जिससे | by which |
| अवध | अयोध्या | Ayodhya |
| अनाथ | रक्षक से वंचित | without a protector |
| न | नहीं | not |
| होई | हो जाए | become |
2 मंत्रहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा।।
English explanation
Rama raised the minister and explained: Dear sir, you have thoroughly examined the principles of duty.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मंत्रहि | मंत्री को | the minister |
| राम | श्रीराम ने | Rama |
| उठाइ | उठाकर | having raised him |
| प्रबोधा | समझाया | explained to him |
| तात | हे तात; आदरणीय संबोधन | dear sir; respectful address |
| धरम | धर्म के | of duty and righteousness |
| मतु | सिद्धांत | principles |
| तुम्ह | आपने | you have |
| सबु | पूरी तरह | thoroughly |
| सोधा | विचारकर समझा | examined and understood |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.95
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 422
- सहायक विषय
- लक्ष्मण-निषाद-संवाद, श्रीराम-सीतासे सुमन्त्रका संवाद, सुमन्त्रका लौटना
- मुद्रित पृष्ठ
- 422, 422
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।