अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए।।
मूल पाठ
तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए।।
मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई।।
स्रोत अभिलेख 2.106 · पुस्तक पृ. 431, 432
भावार्थ
मूल पाठ के बाद[स्नान,पूजन आदि सब करके] तब प्रभु श्रीरामजी भरद्वाजजीके पास आये। उन्हें दण्डवत् करते हुए ही मुनिने हृदयसे लगा लिया। मुनिके मनका आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो उन्हें ब्रह्मानन्दकी राशि मिल गयी हो॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 431 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए।।
English explanation
Then Lord Rama came to Bharadvaja. As Rama prostrated himself, the sage embraced him.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| प्रभु | प्रभु श्रीराम | Lord Rama |
| भरद्वाज | ऋषि भरद्वाज | the sage Bharadvaja |
| पहिं | के पास | to; into the presence of |
| आए | आए | came |
| करत | करते समय | while performing |
| दंडवत | भूमि पर पूरा शरीर फैलाकर प्रणाम | full prostration in reverence |
| मुनि | मुनि भरद्वाज ने | the sage Bharadvaja |
| उर | हृदय से; छाती से | to his breast |
| लाए | लगा लिया | drew close; embraced |
2 मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई।।
English explanation
The joy in the sage’s heart cannot be expressed at all; it was as though he had gained a whole treasure of the bliss of Brahman.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुनि | मुनि के | of the sage |
| मन | मन का | in the heart |
| मोद | आनंद | joy |
| न | नहीं | not |
| कछु | कुछ भी | at all |
| कहि | कहा | expressed |
| जाइ | जा सकता | can be |
| ब्रह्मानंद | ब्रह्म के परम आनंद की | of the supreme bliss of Brahman |
| रासि | राशि; संचित निधि | abundant treasure |
| जनु | मानो | as though |
| पाई | पा ली | had obtained |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.106
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 431
- सहायक विषय
- प्रयाग पहुँचना, श्रीराम-भरद्वाज-संवाद, यमुनातीरनिवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 431, 432
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