अयोध्याकाण्ड · दोहा 106 · दोहा/सोरठा
दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।
दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।
लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि।।106।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.106 · पुस्तक पृ. 431, 432
भावार्थ और शब्दार्थ
1 दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।
मुनिश्रेष्ठ ने आशीर्वाद दिया; उनके हृदय में अत्यंत आनंद था, यह समझकर कि—
English explanation
The eminent sage gave his blessing, with immense joy in his heart, thinking that—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| दीन्हि | दिया | gave |
| असीस | आशीर्वाद | a blessing |
| मुनीस | मुनिश्रेष्ठ भरद्वाज ने | Bharadvaja, the eminent sage |
| उर | हृदय में | in his heart |
| अति | अत्यंत | immense |
| अनंदु | आनंद | joy |
| अस | ऐसा | thus |
| जानि | जानकर; समझकर | thinking; understanding |
2 लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि।।106।।
मानो विधाता ने उनके पुण्यकर्मों के फल लाकर आँखों के सामने प्रत्यक्ष कर दिए हों।
English explanation
It was as though the Creator had brought the fruits of his virtuous deeds and made them visible before his eyes.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लोचन | आँखों के | to the eyes |
| गोचर | प्रत्यक्ष; दिखाई देने योग्य | visible; directly perceptible |
| सुकृत | पुण्यकर्मों के | of virtuous deeds |
| फल | फल | fruits; rewards |
| मनहुँ | मानो | as though |
| किए | कर दिए | had made |
| बिधि | विधाता ने | the Creator |
| आनि | लाकर | having brought |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 106
- स्रोत अभिलेख
- 2.106
- सहायक विषय
- प्रयाग पहुँचना, श्रीराम-भरद्वाज-संवाद, यमुनातीरनिवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 431, 432
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।