अयोध्याकाण्ड · दोहा 105 · दोहा/सोरठा
सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम।
सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम।
बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम।।105।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.105 · पुस्तक पृ. 430, 431
भावार्थ और शब्दार्थ
1 सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम।
पुण्यात्मा, निर्मल साधु तीर्थराज की सेवा करते हैं और अपनी सभी मनोकामनाएँ प्राप्त करते हैं।
English explanation
Virtuous, pure saints attend upon the pilgrimage king and obtain the fulfillment of all their wishes.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सेवहिं | सेवा करते हैं | attend upon |
| सुकृति | पुण्यात्मा | virtuous |
| साधु | साधुजन | saints |
| सुचि | निर्मल; पवित्र | pure |
| पावहिं | प्राप्त करते हैं | obtain |
| सब | सभी | all |
| मनकाम | मन की इच्छाएँ | heart’s wishes |
2 बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम।।105।।
वेद और पुराणों के समूह उसके स्तुतिगायक हैं, जो उसके निर्मल गुणों का वर्णन करते हैं।
English explanation
The Vedas and the Puranas are his court bards, proclaiming his host of stainless virtues.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बंदी | स्तुतिगायक; दरबारी भाट | court bards; panegyrists |
| बेद | वेद | the Vedas |
| पुरान | पुराण | the Puranas |
| गन | समूह | collective body |
| कहहिं | कहते; वर्णन करते हैं | proclaim; describe |
| बिमल | निर्मल | stainless |
| गुन | गुणों का | of virtues |
| ग्राम | समूह | host; multitude |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 105
- स्रोत अभिलेख
- 2.105
- सहायक विषय
- प्रयाग पहुँचना, श्रीराम-भरद्वाज-संवाद, यमुनातीरनिवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 430, 431
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।