अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दजैसे मुख [का प्रतिबिम्ब] दर्पणमें दीखता है और दर्पण अपने हाथमें है, फिर भी वह (मुखका प्रतिबिम्ब) पकड़ा नहीं जाता, इसी प्रकार भरतजीकी यह अद्भुत वाणी भी पकड़में नहीं आती (शब्दोंसे उसका आशय समझमें नहीं आता)। [किसीसे कुछ उत्तर देते नहीं बना] तब राजा जनकजी, भरतजी तथा मुनि वसिष्ठजी समाजके साथ वहाँ गये जहाँ देवतारूपी कुमुदोंके खिलानेवाले (सुख देनेवाले) चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी थे॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 589 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी।।
भूप भरत मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू।।
स्रोत अभिलेख 2.294 · पुस्तक पृ. 589, 590
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी।।
English explanation
Like a face reflected in a mirror held in one’s own hand, yet impossible to grasp, such is this wondrous speech.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ज्यौ | जैसे | just as |
| मुख | मुख का प्रतिबिंब | the reflected face |
| मुकुर | दर्पण में | in the mirror |
| मुकुरु | दर्पण | the mirror |
| निज | अपने | one’s own |
| पानी | हाथ में | in the hand |
| गहि | पकड़ा | grasped |
| न | नहीं | not |
| जाइ | जा सकता | can be |
| अस | ऐसी | such |
| अदभुत | अद्भुत | wondrous |
| बानी | वाणी | speech |
2 भूप भरत मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू।।
English explanation
King Janaka, Bharata, and the sage went with the assembly to where Rama was—the moon to the gods likened to night-blooming lilies.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भूप | राजा जनक | King Janaka |
| भरत | भरत | Bharata, Rama’s brother |
| मुनि | मुनि वसिष्ठ | the sage Vasishtha |
| सहित | के साथ | along with |
| समाजू | समाज अथवा सभा | the assembly |
| गे | गए | went |
| जहँ | जहाँ | where |
| बिबुध | देवता | the gods |
| कुमुद | कुमुद पुष्प; यहाँ देवताओं का रूपक | night-blooming lilies, figuratively the gods |
| द्विजराजू | चंद्रमा; यहाँ राम का रूपक | the moon, figuratively Rama |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.294
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 589
- सहायक विषय
- जनक-वसिष्ठादि-संवाद, इन्द्रकी चिन्ता, सरस्वतीका इन्द्रको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 589, 590
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।