अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दजिस वृक्षके नीचे प्रभु जा बैठते हैं, कल्पवृक्ष भी उसकी बड़ाई करते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंकी रजका स्पर्श करके पृथ्वी अपना बड़ा सौभाग्य मानती है॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 437 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई।।
परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा।।
स्रोत अभिलेख 2.113 · पुस्तक पृ. 437, 438
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई।।
English explanation
The wish-fulfilling trees praise whichever tree the Lord goes and sits beneath.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जेहि | जिस | whichever |
| तरु | वृक्ष के | tree |
| तर | नीचे | beneath |
| प्रभु | प्रभु राम | the Lord, Rama |
| बैठहिं | बैठते हैं | sits |
| जाई | जाकर | having gone |
| करहिं | करते हैं | offer |
| कलपतरु | इच्छापूर्ति करने वाले दिव्य वृक्ष | celestial wish-fulfilling trees |
| तासु | उस वृक्ष की | of that tree |
| बड़ाई | प्रशंसा | praise |
2 परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा।।
English explanation
Touching the dust of Rama's lotus feet, the earth considers her good fortune immense.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| परसि | छूकर | having touched |
| राम | राम के | Rama's |
| पद | चरण | feet |
| पदुम | कमल | lotuses |
| परागा | धूल; पराग | dust; pollen |
| मानति | मानती है | considers |
| भूमि | पृथ्वी | the earth |
| भूरि | बहुत बड़ा | immense |
| निज | अपना | her own |
| भागा | सौभाग्य | good fortune |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.113
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 437
- सहायक विषय
- यमुनाको प्रणाम, वनवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 437, 438
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।