अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दजिनके वियोगमें पशु इस प्रकार व्याकुल हैं, उनके वियोगमें प्रजा, माता और पिता कैसे जीते रहेंगे? श्रीरामचन्द्रजीने जबर्दस्ती सुमन्त्रको लौटाया। तब आप गङ्गाजीके तीरपर आये॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 426 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें।।
बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए।।
स्रोत अभिलेख 2.1 · पुस्तक पृ. 426, 426
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें।।
English explanation
If animals are so distressed by separation from Rama, how will his people, mother, and father remain alive?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जासु | जिनके; राम के | whose; referring to Rama |
| बियोग | वियोग में | in separation |
| बिकल | व्याकुल | distressed |
| पसु | पशु | animals |
| ऐसे | इस प्रकार | like this |
| प्रजा | प्रजा; राज्य के लोग | subjects; the people |
| मातु | माता | mother |
| पितु | पिता | father |
| जिइहहिं | जीवित रहेंगे | will remain alive |
| कैसें | कैसे | how |
2 बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए।।
English explanation
Rama sent Sumantra back against his wishes and then himself came to the bank of the Ganges.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बरबस | इच्छा के विरुद्ध; बलपूर्वक | against his wishes; forcibly |
| राम | राम ने | Rama |
| सुमंत्रु | सुमंत्र को; दशरथ के मंत्री और सारथी को | Sumantra, Dasharatha’s minister and charioteer |
| पठाए | वापस भेज दिया | sent back |
| सुरसरि | गंगा के | of the Ganges |
| तीर | तट पर | to the bank |
| आपु | स्वयं | himself |
| तब | तब | then |
| आए | आए | came |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.1
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 426
- सहायक विषय
- केवटका प्रेम और गङ्गा-पार जाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 426, 426
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।