अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जहाँ जनक गुर मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दजहाँ जनकजी और गुरु वसिष्ठजीकी बुद्धिकी गति कुण्ठित हो गयी, उस दिव्य प्रेमको प्राकृत (लौकिक) कहनेमें बड़ा दोष है। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीके वियोगका वर्णन करते सुनकर लोग कविको कठोरहृदय समझेंगे॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 610 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
जहाँ जनक गुर मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी।।
बरनत रघुबर भरत बियोगू। सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू।।
स्रोत अभिलेख 2.318 · पुस्तक पृ. 610, 610
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 जहाँ जनक गुर मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी।।
English explanation
Where even Janaka’s and the guru’s understanding is bewildered, calling this love merely worldly is a grave fault.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जहाँ | जहाँ; जिस प्रसंग में | where; in a situation where |
| जनक | राजा जनक की | of King Janaka |
| गुर | गुरु वसिष्ठ की | of the guru Vashishtha |
| मति | बुद्धि | understanding |
| भोरी | भोली या चकित पड़ गई | became bewildered |
| प्राकृत | लौकिक; साधारण सांसारिक | worldly; ordinary |
| प्रीति | प्रेम | love |
| कहत | कहने में; बताते हुए | in calling it |
| बड़ि | बड़ा | great |
| खोरी | दोष | fault |
2 बरनत रघुबर भरत बियोगू। सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू।।
English explanation
Hearing the description of Rama and Bharata’s separation, people will consider the poet hard-hearted.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बरनत | वर्णन करते हुए | describing |
| रघुबर | रघुकुलश्रेष्ठ राम का | of Rama, foremost of Raghu’s lineage |
| भरत | भरत का | of Bharata |
| बियोगू | वियोग; बिछोह | separation |
| सुनि | सुनकर | on hearing |
| कठोर | कठोर हृदय वाला | hard-hearted |
| कबि | कवि को | the poet |
| जानिहि | समझेंगे | will consider |
| लोगू | लोग | people |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.318
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 610
- सहायक विषय
- भरतजीका अयोध्या लौटना, भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना, नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके चरित्र-श्रवणकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 610, 610
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।