अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी।।
मूल पाठ
सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी।।
भेंटि भरत रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए।।
स्रोत अभिलेख 2.318 · पुस्तक पृ. 610, 610
भावार्थ
मूल पाठ के बादवह संकोच-रस अकथनीय है। अतएव कविकी सुन्दर वाणी उस समय उसके प्रेमको स्मरण करके सकुचा गयी। भरतजीको भेंटकर श्रीरघुनाथजीने उनको समझाया। फिर हॢषत होकर शत्रुघ्रजीको हृदयसे लगा लिया॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 610 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी।।
English explanation
The feeling of that tender hesitation is beyond description; recalling the occasion and its affection, even eloquent speech shrank from expressing it.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वह; उस | that |
| सकोच | संकोच; प्रेमभरा संकुचन | tender hesitation; restraint |
| रसु | भाव; रस | emotional essence |
| अकथ | जिसका वर्णन नहीं हो सकता | indescribable |
| सुबानी | सुंदर वाणी | eloquent speech |
| समउ | उस समय या अवसर को | the occasion |
| सनेहु | स्नेह को | the affection |
| सुमिरि | स्मरण करके | recalling |
| सकुचानी | संकुचित हो गई | shrank back in hesitation |
2 भेंटि भरत रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए।।
English explanation
Rama embraced Bharata and consoled him; then, joyfully, he clasped Shatrughna to his heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भेंटि | गले लगाकर | having embraced |
| भरत | भरत को | Bharata |
| रघुबर | रघुकुलश्रेष्ठ राम ने | Rama, foremost of Raghu’s lineage |
| समुझाए | समझाया; सांत्वना दी | reassured; consoled |
| पुनि | फिर | then |
| रिपुदवनु | शत्रुओं का दमन करने वाले शत्रुघ्न को | Shatrughna, subduer of enemies |
| हरषि | प्रसन्न होकर | joyfully |
| हियँ | हृदय से; छाती से | to his heart |
| लाए | लगा लिया | clasped |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.318
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 610
- सहायक विषय
- भरतजीका अयोध्या लौटना, भरतजीद्वारा पादुकाकी स्थापना, नन्दिग्राममें निवास और श्रीभरतजीके चरित्र-श्रवणकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 610, 610
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।