अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
काह करौ सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ।।
मूल पाठ
काह करौ सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ।।
स्रोत अभिलेख 2.2 · पुस्तक पृ. 360, 360
भावार्थ
मूल पाठ के बादसखी! क्या करूँ, मेरा तो सीधा स्वभाव है। मैं दायाँ-बायाँ कुछ भी नहीं जानती॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 360 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 काह करौ सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ।।
English explanation
“Friend, what can I do? I am simple by nature; I understand neither what favors me nor what harms me.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| काह | क्या | what |
| करौ | मैं करूँ | should I do |
| सखि | हे सखी | friend |
| सूध | सीधा; सरल | simple; straightforward |
| सुभाऊ | स्वभाव | nature |
| दाहिन | अनुकूल; हितकारी | favorable; beneficial |
| बाम | प्रतिकूल; अहितकारी | unfavorable; harmful |
| न | नहीं | not |
| जानउँ | मैं जानती हूँ | I know |
| काऊ | कुछ भी | anything at all |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.2
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 360
- सहायक विषय
- सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 360, 360
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।