अयोध्याकाण्ड · दोहा 20 · दोहा/सोरठा
अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह।
अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह।
केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह।।20।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.2 · पुस्तक पृ. 360, 360
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह।
‘अपने आचरण से आज तक मैंने किसी का बुरा नहीं किया।’
English explanation
“In my conduct, I have never harmed anyone to this day.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अपने | अपने | my own |
| चलत | आचरण से | through conduct |
| न | नहीं | not |
| आजु | आज | today |
| लगि | तक | until |
| अनभल | अहित; बुरा | harm |
| काहुक | किसी का | to anyone |
| कीन्ह | किया | done |
2 केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह।।20।।
‘किस पाप के कारण दैव ने मुझे एक ही बार में असहनीय दुःख दे दिया?’
English explanation
“For what sin has fate given me unbearable sorrow all at once?”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| केहिं | किस | for what |
| अघ | पाप के कारण | sin |
| एकहि | एक ही | a single; just one |
| बार | बार में | occasion; at once |
| मोहि | मुझे | to me |
| दैअँ | दैव ने; भाग्य ने | fate |
| दुसह | असहनीय | unbearable |
| दुखु | दुःख | sorrow |
| दीन्ह | दिया | gave |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 20
- स्रोत अभिलेख
- 2.2
- सहायक विषय
- सरस्वतीका मन्थराकी बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 360, 360
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।