अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई।।
मूल पाठ
उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई।।
दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई।।
स्रोत अभिलेख 2.263 · पुस्तक पृ. 563, 563
भावार्थ
मूल पाठ के बादहृदयमें भी तुमपर कुटिलताका आरोप करनेसे यह लोक (यहाँके सुख, यश आदि) बिगड़ जाता है और परलोक भी नष्ट हो जाता है (मरनेके बाद भी अच्छी गति नहीं मिलती)। माता कैकेयीको तो वे ही मूर्ख दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओंकी सभाका सेवन नहीं किया है॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 563 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई।।
English explanation
By harboring malice toward you, a person ruins both this-worldly and otherworldly well-being.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| उर | हृदय में | in the heart |
| आनत | लाते ही; रखने पर | upon harboring |
| तुम्ह | तुम्हारे | you |
| पर | प्रति | toward |
| कुटिलाई | कुटिलता; दुर्भावना | malice |
| जाइ | हो जाता है | comes to be |
| लोकु | इस लोक का कल्याण | well-being in this world |
| परलोकु | परलोक का कल्याण | well-being in the hereafter |
| नसाई | नष्ट | ruined |
2 दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई।।
English explanation
Only those foolish people who have not attended upon a teacher and the company of holy people blame your mother.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| दोसु | दोष | blame |
| देहिं | देते हैं | assign |
| जननिहि | माता को; यहाँ कैकेयी को | to your mother, here Kaikeyi |
| जड़ | मूर्ख; विवेकहीन | foolish |
| तेई | वे ही | those very people |
| जिन्ह | जिन्होंने | who |
| गुर | गुरु | teacher |
| साधु | साधुओं की | of holy people |
| सभा | सभा; सत्संग | assembly; holy company |
| नहिं | नहीं | not |
| सेई | सेवा की; संगति की | attended upon; associated with |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.263
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 563
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरतादिका संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 563, 563
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।