अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दनिषादराज और लक्ष्मणजीसहित श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी [नावसे] उतरकर गङ्गाजीकी रेत (बालू)में खड़े हो गये। तब केवटने उतरकर दण्डवत् की। [उसको दण्डवत् करते देखकर] प्रभुको संकोच हुआ कि इसको कुछ दिया नहीं॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 428 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता।।
केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा।।
स्रोत अभिलेख 2.102 · पुस्तक पृ. 428, 428
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता।।
English explanation
Sita and Rama, together with Guha and Lakshmana, disembarked and stood on the sand beside the Ganges.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| उतरि | उतरकर | having disembarked |
| ठाड़ | खड़े | standing |
| भए | हुए | became |
| सुरसरि | देवनदी गंगा की | of the Ganges, the divine river |
| रेता | रेत पर | on the sand |
| सीयराम | सीता और राम | Sita and Rama |
| गुह | निषादराज गुह | Guha, the Nishada chief |
| लखन | लक्ष्मण | Lakshmana, Rama’s brother |
| समेता | सहित | together with |
2 केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा।।
English explanation
The boatman disembarked and prostrated himself. Rama felt embarrassed that he had given him nothing.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| केवट | नाविक | the boatman |
| उतरि | उतरकर | having disembarked |
| दंडवत | भूमि पर पूरा शरीर झुकाकर प्रणाम | full-length prostration |
| कीन्हा | किया | performed |
| प्रभुहि | प्रभु राम को | to Lord Rama |
| सकुच | संकोच हुआ | felt embarrassment |
| एहि | इस केवट को | to this boatman |
| नहिं | नहीं | not |
| कछु | कुछ भी | anything |
| दीन्हा | दिया | given |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.102
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 428
- सहायक विषय
- केवटका प्रेम और गङ्गा-पार जाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 428, 428
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।