अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहे माता! तू प्रसन्न मनसे मुझे आज्ञा दे, जिससे मेरी वनयात्रामें आनन्द-मङ्गल हो। मेरे स्नेहवश भूलकर भी डरना नहीं। हे माता! तेरी कृपासे आनन्द ही होगा॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 388 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता।।
जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें।।
स्रोत अभिलेख 2.53 · पुस्तक पृ. 387, 388
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता।।
English explanation
Mother, grant your permission with a joyful heart, so that I may go to the forest with joy and auspiciousness.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आयसु | आज्ञा; अनुमति | permission; leave |
| देहि | दीजिए | give; grant |
| मुदित | प्रसन्न | joyful |
| मन | मन से | with a heart |
| माता | हे माता | O mother |
| जेहिं | जिससे; जिस आज्ञा से | by which; so that |
| मुद | आनंद | joy |
| मंगल | मंगल; शुभता | auspiciousness; well-being |
| कानन | वन को | to the forest |
| जाता | मैं जाऊँ | I may go |
2 जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें।।
English explanation
Mother, do not be afraid through innocent tenderness under love’s sway; through your grace I shall have joy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जनि | मत | do not |
| सनेह | स्नेह के | of affection |
| बस | वश होकर | under the sway |
| डरपसि | तुम डरो | you fear |
| भोरें | भोलेपन में; अनजान आशंका से | in innocent apprehension |
| आनँदु | आनंद | joy |
| अंब | हे माता | O mother |
| अनुग्रह | कृपा से | through grace; through favor |
| तोरें | आपकी | your |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.53
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 388
- सहायक विषय
- श्रीराम-कौसल्या-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 387, 388
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।