अयोध्याकाण्ड · दोहा 53 · दोहा/सोरठा
बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान।
बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान।
आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान।।53।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.53 · पुस्तक पृ. 387, 388
भावार्थ और शब्दार्थ
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1बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान।
पिता के वचन को प्रमाण मानकर चौदह वर्ष वन में रहकर,
English explanation
After dwelling in the forest for fourteen years, honoring my father’s word as binding,
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बरष | वर्ष | years |
| चारिदस | चौदह | fourteen |
| बिपिन | वन में | in the forest |
| बसि | रहकर | having dwelt |
| करि | करके; मानकर | having made; having accepted |
| पितु | पिता के | father’s |
| बचन | वचन को | word |
| प्रमान | प्रमाण; मान्य आदेश | authority; a binding command |
2 आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान।।53।।
मैं लौटकर फिर आपके चरणों के दर्शन करूँगा; अपना मन उदास मत कीजिए।
English explanation
I shall return and behold your feet again; do not let your heart grow sorrowful.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आइ | आकर; लौटकर | having come back |
| पाय | आपके चरण | your feet |
| पुनि | फिर | again |
| देखिहउँ | मैं देखूँगा; दर्शन करूँगा | I shall see; I shall behold |
| मनु | मन को | your heart |
| जनि | मत | do not |
| करसि | तुम करो | you make |
| मलान | म्लान; उदास | dejected; sorrowful |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 53
- स्रोत अभिलेख
- 2.53
- सहायक विषय
- श्रीराम-कौसल्या-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 387, 388
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