अयोध्याकाण्ड · दोहा 52 · दोहा/सोरठा
जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।
जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।
जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति।।52।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.52 · पुस्तक पृ. 387, 387
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।
जिस शुभ घड़ी को सभी नर-नारी इस प्रकार अत्यंत व्याकुल होकर चाहते हैं—
English explanation
That auspicious hour which all men and women long for with such intense yearning—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जेहि | जिसको | which |
| चाहत | चाहते हैं | long for |
| नर | पुरुष | men |
| नारि | स्त्रियाँ | women |
| सब | सभी | all |
| अति | अत्यंत | deeply |
| आरत | व्याकुल | anguished with longing |
| एहि | इस | this |
| भाँति | प्रकार | way |
2 जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति।।52।।
जैसे प्यासे चातक और चातकी शरद ऋतु में स्वाति नक्षत्र की वर्षा के लिए व्याकुल रहते हैं।
English explanation
Like thirsty male and female chataka birds yearning for rain under the Swati asterism in autumn.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जिमि | जैसे | just as |
| चातक | नर चातक पक्षी | the male chataka bird |
| चातकि | मादा चातक पक्षी | the female chataka bird |
| तृषित | प्यासे | thirsty |
| बृष्टि | वर्षा के लिए | for rain |
| सरद | शरद | autumn |
| रितु | ऋतु में | in the season |
| स्वाति | स्वाति नक्षत्र में | under the Swati asterism |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 52
- स्रोत अभिलेख
- 2.52
- सहायक विषय
- श्रीराम-कौसल्या-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 387, 387
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