अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहे नाथ! हे दीनदयाल! आपकी कृपासे अब मुझे कुछ नहीं चाहिये। लौटती बार आप मुझे जो कुछ देंगे, वह प्रसाद मैं सिर चढ़ाकर लूँगा॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 428 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।।
फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा।।
स्रोत अभिलेख 2.102 · पुस्तक पृ. 428, 428
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।।
English explanation
‘Lord, compassionate to the lowly, through your grace I now need nothing more.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अब | अब | now |
| कछु | कुछ भी | anything |
| नाथ | हे स्वामी | O Lord |
| न | नहीं | not |
| चाहिअ | चाहिए | is needed |
| मोरें | मुझे | by me |
| दीनदयाल | हे दीनों पर दया करने वाले | O compassionate protector of the lowly |
| अनुग्रह | कृपा से | through grace |
| तोरें | आपकी | your |
2 फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा।।
English explanation
‘Whatever you give me on your return, I will receive as your gracious gift, placing it upon my head in reverence.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| फिरती | लौटते हुए | returning |
| बार | समय | at the time |
| मोहि | मुझे | to me |
| जे | जो कुछ | whatever |
| देबा | आप देंगे | you will give |
| सो | वह | that |
| प्रसादु | कृपा का उपहार | gracious gift |
| मैं | मैं | I |
| सिर | सिर पर | upon my head |
| धरि | रखकर | having placed |
| लेबा | स्वीकार करूँगा | will accept |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.102
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 428
- सहायक विषय
- केवटका प्रेम और गङ्गा-पार जाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 428, 428
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।