अयोध्याकाण्ड · दोहा 102 · दोहा/सोरठा
बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ।
बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ।
बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ।।102।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.102 · पुस्तक पृ. 428, 428
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ।
राम, लक्ष्मण और सीता ने बहुत आग्रह किया, किंतु केवट कुछ भी नहीं लेता।
English explanation
Rama, Lakshmana, and Sita urged him greatly, but the boatman would accept nothing.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बहुत | बहुत | greatly |
| कीन्ह | आग्रह किया | urged |
| प्रभु | प्रभु राम ने | Lord Rama |
| लखन | लक्ष्मण ने | Lakshmana |
| सियँ | सीता ने | Sita |
| नहिं | नहीं | not |
| कछु | कुछ भी | anything |
| केवटु | केवट | the boatman |
| लेइ | लेता है | accepts |
2 बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ।।102।।
करुणा के धाम राम ने निर्मल भक्ति का वर देकर केवट को विदा किया।
English explanation
Rama, the abode of compassion, bade the boatman farewell after granting him the boon of pure devotion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिदा | विदा | farewell |
| कीन्ह | किया | gave |
| करुनायतन | करुणा के धाम राम ने | Rama, the abode of compassion |
| भगति | भक्ति का | of devotion |
| बिमल | निर्मल | pure |
| बरु | वरदान | boon |
| देइ | देकर | having granted |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 102
- स्रोत अभिलेख
- 2.102
- सहायक विषय
- केवटका प्रेम और गङ्गा-पार जाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 428, 428
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।