अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दअब मेरे मनमें एक ही अभिलाषा है। हे नाथ! वह भी आपहीके अनुग्रहसे पूरी होगी। राजाका सहज प्रेम देखकर मुनिने प्रसन्न होकर कहा—नरेश! आज्ञा दीजिये (कहिये, क्या अभिलाषा है?)॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 346 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें।।
मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू।।
स्रोत अभिलेख 2.3 · पुस्तक पृ. 345, 346
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें।।
English explanation
Now there is one desire in my heart; O master, may it be fulfilled through your grace.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अब | अब | now |
| अभिलाषु | अभिलाषा | desire |
| एकु | एक | one |
| मन | मन में | in the heart |
| मोरें | मेरे | my |
| पूजहि | पूरी हो | may be fulfilled |
| नाथ | हे स्वामी | O master |
| अनुग्रह | कृपा से | through grace |
| तोरें | आपकी | your |
2 मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू।।
English explanation
Seeing the sage pleased and recognizing his natural affection, the king said, “Please grant permission.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुनि | मुनि वसिष्ठ को | the sage Vasishtha |
| प्रसन्न | प्रसन्न | pleased |
| लखि | देखकर | seeing |
| सहज | स्वाभाविक | natural |
| सनेहू | स्नेह | affection |
| कहेउ | कहा | said |
| नरेस | राजा दशरथ ने | King Dasharatha |
| रजायसु | आज्ञा या अनुमति | permission |
| देहू | दीजिए | please grant |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.3
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 346
- सहायक विषय
- मंगलाचरण
- मुद्रित पृष्ठ
- 345, 346
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।