अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा।।
मूल पाठ
अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा।।
सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी।।
स्रोत अभिलेख 2.283 · पुस्तक पृ. 580, 580
भावार्थ
मूल पाठ के बादकिन्तु आज मेरा ऐसा कहना भी अनुचित है। शोक और स्नेहमें सयानापन (विवेक) कम हो जाता है (लोग कहेंगे कि मैं स्नेहवश भरतकी बड़ाई कर रही हूँ)। कौसल्याजीकी गङ्गाजीके समान पवित्र करनेवाली वाणी सुनकर सब रानियाँ स्नेहके मारे विकल हो उठीं॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 580 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा।।
English explanation
It is improper for me to speak this way today; grief and affection diminish one's judgment.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अनुचित | अनुचित | improper |
| आजु | आज | today |
| कहब | कहना | speaking |
| अस | ऐसा | like this |
| मोरा | मेरा | my |
| सोक | शोक में | in grief |
| सनेहँ | स्नेह में | in affection |
| सयानप | समझ-बूझ | sound judgment |
| थोरा | कम | little; diminished |
2 सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी।।
English explanation
Hearing these words, pure as the Ganges, all the queens became overwhelmed with affection.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | having heard |
| सुरसरि | गंगा | the Ganges |
| सम | के समान | like |
| पावनि | पवित्र करने वाली | purifying |
| बानी | वाणी | words |
| भईं | हो गईं | became |
| सनेह | स्नेह से | with affection |
| बिकल | व्याकुल | overwhelmed |
| सब | सभी | all |
| रानी | रानियाँ | queens |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.283
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 580
- सहायक विषय
- कौसल्या-सुनयना-संवाद, श्रीसीताजीका शील
- मुद्रित पृष्ठ
- 580, 580
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।