अयोध्याकाण्ड · दोहा 283 · दोहा/सोरठा
कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।
कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।
को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि।।283।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.283 · पुस्तक पृ. 580, 580
भावार्थ और शब्दार्थ
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1कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।
कौसल्या ने धैर्य धारण करके कहा, ‘हे मिथिला की रानी, सुनिए।’
English explanation
Regaining composure, Kausalya said, ‘Listen, noble queen of Mithila.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कौसल्या | कौसल्या; राम की माता | Kausalya, Rama's mother |
| कह | कहती हैं | says |
| धीर | धैर्य | composure |
| धरि | धारण करके | having gathered |
| सुनहु | सुनिए | listen |
| देबि | हे देवी; आदरसूचक संबोधन | noble lady; respectful address |
| मिथिलेसि | हे मिथिला की रानी; सुनयना | queen of Mithila, Sunayana |
2 को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि।।283।।
‘विवेक के भंडार आपके पति और आपको कौन उपदेश दे सकता है?’
English explanation
‘Who could counsel your husband, a treasury of discernment, or you?’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| को | कौन | who |
| बिबेकनिधि | विवेक के भंडार | a treasury of discernment |
| बल्लभहि | आपके पति को; राजा जनक को | your husband, King Janaka |
| तुम्हहि | आपको | you |
| सकइ | सकता है | could |
| उपदेसि | उपदेश देना | give counsel |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 283
- स्रोत अभिलेख
- 2.283
- सहायक विषय
- कौसल्या-सुनयना-संवाद, श्रीसीताजीका शील
- मुद्रित पृष्ठ
- 580, 580
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