अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा।।
मूल पाठ
अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा।।
बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं।।
स्रोत अभिलेख 2.101 · पुस्तक पृ. 427, 428
भावार्थ
मूल पाठ के बादअत्यन्त आनन्द और प्रेममें उमँगकर वह भगवान्के चरणकमल धोने लगा। सब देवता फूल बरसाकर सिहाने लगे कि इसके समान पुण्यकी राशि कोई नहीं है॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 427 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा।।
English explanation
With immense joy and overflowing love, he began washing Rama's lotus-like feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अति | अत्यंत | immense |
| आनंद | आनंद | joy |
| उमगि | उमड़कर | welling up |
| अनुरागा | प्रेम | loving devotion |
| चरन | चरण | feet |
| सरोज | कमल-जैसे | lotus-like |
| पखारन | धोने | to wash |
| लागा | लगा | began |
2 बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं।।
English explanation
Showering flowers, all the gods admire his good fortune: “No one is such a store of merit as he.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बरषि | बरसाकर | showering |
| सुमन | फूल | flowers |
| सुर | देवता | gods |
| सकल | सभी | all |
| सिहाहीं | सौभाग्य की सराहना करते हैं | admire his good fortune |
| एहि | इस केवट के | this boatman's |
| सम | समान | equal to |
| पुन्यपुंज | पुण्य की राशि | a store of spiritual merit |
| कोउ | कोई | anyone |
| नाहीं | नहीं है | there is none |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.101
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 427
- सहायक विषय
- केवटका प्रेम और गङ्गा-पार जाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 427, 428
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।