अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी।।
मूल पाठ
पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी।।
केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा।।
स्रोत अभिलेख 2.101 · पुस्तक पृ. 427, 428
भावार्थ
मूल पाठ के बादप्रभुके इन वचनोंको सुनकर गङ्गाजीकी बुद्धि मोहसे खिं च गयी थी [कि ये साक्षात् भगवान् होकर भी पार उतारनेके लिये केवटका निहोरा कैसे कर रहे हैं]। परन्तु [समीप आनेपर अपनी उत्पत्तिके स्थान] पदनखोंको देखते ही [उन्हें पहचानकर] देवनदी गङ्गाजी हॢषत हो गयीं। (वे समझ गयीं कि भगवान् नरलीला कर रहे हैं, इससे उनका मोह नष्ट हो गया; और इन चरणोंका स्पर्श प्राप्त करके मैं धन्य होऊँगी, यह विचारकर वे हॢषत हो गयीं।) केवट श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर कठौतेमें भरकर जल ले आया॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 427 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी।।
English explanation
Seeing the nails of his feet, the divine river Ganga rejoiced; hearing the Lord's words, she drew delusion out of her understanding.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पद | चरणों के | of the feet |
| नख | नख | nails |
| निरखि | देखकर | having seen |
| देवसरि | देवनदी गंगा | Ganga, the divine river |
| हरषी | हर्षित हुईं | rejoiced |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| प्रभु | प्रभु राम के | of Lord Rama |
| बचन | वचन | words |
| मोहँ | मोह को | delusion |
| मति | बुद्धि से | from her understanding |
| करषी | खींचकर दूर किया | drew out; dispelled |
2 केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा।।
English explanation
The boatman received Rama's permission and brought a wooden vessel filled with water.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| केवट | नाविक | the boatman |
| राम | राम की | Rama's |
| रजायसु | आज्ञा | permission or command |
| पावा | प्राप्त की | received |
| पानि | पानी | water |
| कठवता | लकड़ी का पात्र | wooden basin |
| भरि | भरकर | having filled |
| लेइ | लेकर | taking it |
| आवा | आया | came |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.101
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 427
- सहायक विषय
- केवटका प्रेम और गङ्गा-पार जाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 427, 428
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।