अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जासु नाम सुमरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।।
मूल पाठ
जासु नाम सुमरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।।
सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा।।
स्रोत अभिलेख 2.101 · पुस्तक पृ. 427, 428
भावार्थ
मूल पाठ के बादएक बार जिनका नाम स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागरके पार उतर जाते हैं, और जिन्होंने [वामनावतारमें] जगत्को तीन पगसे भी छोटा कर दिया था (दो ही पगमें त्रिलोकीको नाप लिया था), वही कृपालु श्रीरामचन्द्रजी [गङ्गाजीसे पार उतारनेके लिये] केवटका निहोरा कर रहे हैं!॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 427 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 जासु नाम सुमरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।।
English explanation
By remembering his name just once, people cross the boundless ocean of worldly existence.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जासु | जिनका | whose |
| नाम | नाम | name |
| सुमरत | स्मरण करने पर | on remembering |
| एक | एक | one |
| बारा | बार | time |
| उतरहिं | पार हो जाते हैं | cross over |
| नर | मनुष्य | people |
| भवसिंधु | संसाररूपी समुद्र | ocean of worldly existence |
| अपारा | अपार | boundless |
2 सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा।।
English explanation
That same compassionate Lord entreats the boatman—he who made the world smaller than even three strides.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोइ | वही | that very same one |
| कृपालु | दयालु प्रभु | compassionate Lord |
| केवटहि | केवट से | to the boatman |
| निहोरा | विनती करते हैं | makes an entreaty |
| जेहिं | जिन्होंने | who |
| जगु | जगत | the world |
| किय | कर दिया | made |
| तिहु | तीन | three |
| पगहु | पगों से भी | even than strides |
| ते | से | than |
| थोरा | छोटा | smaller |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.101
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 427
- सहायक विषय
- केवटका प्रेम और गङ्गा-पार जाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 427, 428
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