अरण्यकाण्ड · दोहा 41 · दोहा/सोरठा
नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।
नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।
नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि।।41।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.41 · पुस्तक पृ. 673, 674
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।
अनेक प्रकार से विनती करके और मन में प्रभु को प्रसन्न जानकर—
English explanation
After making entreaties in many ways and recognizing in his heart that the Lord was pleased—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाना | अनेक | many |
| बिधि | प्रकार से | ways |
| बिनती | विनती | entreaties |
| करि | करके | having made |
| प्रभु | प्रभु को | the Lord |
| प्रसन्न | प्रसन्न | pleased |
| जियँ | मन में | in his heart |
| जानि | जानकर | having recognized |
2 नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि।।41।।
तब नारद अपने कमल-समान हाथ जोड़कर ये वचन बोले।
English explanation
Then Narada joined his lotus-like hands and spoke these words.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नारद | देवर्षि नारद | the divine sage Narada |
| बोले | बोले | spoke |
| बचन | वचन | words |
| तब | तब | then |
| जोरि | जोड़कर | having joined |
| सरोरुह | कमल-समान | lotus-like |
| पानि | हाथ | hands |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 41
- स्रोत अभिलेख
- 3.41
- सहायक विषय
- शबरीपर कृपा, नवधा भक्ति-उपदेश और पम्पासरकी ओर प्रस्थान
- मुद्रित पृष्ठ
- 673, 674
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