अरण्यकाण्ड · दोहा 45 · दोहा/सोरठा
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।।
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।।
तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह।।45।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.45 · पुस्तक पृ. 677, 678
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।।
वे गुणों के भंडार, संसार के दुःख से रहित और संदेह से मुक्त हैं।
English explanation
They are repositories of virtue, free from worldly sorrow and rid of doubt.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गुनागार | गुणों के भंडार | repositories of virtue |
| संसार | संसार के | worldly |
| दुख | दुःख | sorrow |
| रहित | से रहित | free from |
| बिगत | दूर हुए | dispelled |
| संदेह | संदेह | doubts |
2 तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह।।45।।
मेरे चरण-कमलों को छोड़कर उन्हें न शरीर प्रिय है, न घर।
English explanation
Apart from my lotus feet, neither body nor home is dear to them.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तजि | छोड़कर; के अतिरिक्त | apart from |
| मम | मेरे | my |
| चरन | चरण | feet |
| सरोज | कमल | lotuses |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| तिन्ह | उन संतों | those saints |
| कहुँ | को | to |
| देह | शरीर | body |
| न | नहीं; न ही | neither; nor |
| गेह | घर | home |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 45
- स्रोत अभिलेख
- 3.45
- सहायक विषय
- नारद-राम-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 677, 678
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।