अरण्यकाण्ड · दोहा 44 · दोहा/सोरठा
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि।।44।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.44 · पुस्तक पृ. 676, 677
भावार्थ और शब्दार्थ
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1अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।
स्त्री अवगुणों की जड़, पीड़ा देने वाली और सभी दुखों की खान है।
English explanation
Woman is the root of faults, a source of pain, and a mine of every sorrow.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अवगुन | दोष; दुर्गुण | faults; vices |
| मूल | जड़; स्रोत | root; source |
| सूलप्रद | पीड़ा देने वाली | causing pain |
| प्रमदा | स्त्री | woman |
| सब | सभी | all |
| दुख | दुख | sorrows |
| खानि | खान; भंडार | mine; repository |
2 ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि।।44।।
हे मुनि, इसलिए यह बात मन में जानकर मैंने रोक दिया।
English explanation
Therefore, sage, knowing this in my heart, I prevented it.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ताते | इसलिए | therefore |
| कीन्ह | किया | did |
| निवारन | रोकना; निवारण | prevention |
| मुनि | हे मुनि | O sage |
| मैं | मैंने | I |
| यह | यह बात | this |
| जियँ | हृदय में; मन में | in my heart |
| जानि | जानकर | having known |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 44
- स्रोत अभिलेख
- 3.44
- सहायक विषय
- नारद-राम-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 676, 677
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