अरण्यकाण्ड · दोहा 43 · दोहा/सोरठा
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।43।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.43 · पुस्तक पृ. 675, 676
भावार्थ और शब्दार्थ
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1काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
काम, क्रोध, लोभ आदि और मद—ये प्रबल मोह की धारा के अंग हैं।
English explanation
Desire, anger, greed and the like, and pride belong to the powerful current of delusion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| काम | कामना | desire |
| क्रोध | क्रोध | anger |
| लोभादि | लोभ आदि | greed and the like |
| मद | अहंकार या घमंड | pride or arrogance |
| प्रबल | शक्तिशाली | powerful |
| मोह | मोह | delusion |
| कै | की | of |
| धारि | धारा | current |
2 तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।43।।
उनमें माया के रूप में चित्रित स्त्री अत्यंत भयंकर और दुःख देने वाली है।
English explanation
Among these, woman portrayed as the embodiment of illusion is exceedingly terrible and brings suffering.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तिन्ह | उन विकारों | those forces |
| महँ | में | among |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| दारुन | भयंकर | terrible |
| दुखद | दुःख देने वाली | causing suffering |
| मायारूपी | माया के रूप वाली | embodying illusion |
| नारि | स्त्री | woman |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 43
- स्रोत अभिलेख
- 3.43
- सहायक विषय
- नारद-राम-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 675, 676
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