अरण्यकाण्ड · दोहा 28 · दोहा/सोरठा
क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।
क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।
चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ।।28।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.28 · पुस्तक पृ. 656, 658
भावार्थ और शब्दार्थ
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1क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।
तब क्रोधित रावण ने सीता को रथ में बैठाकर ले लिया।
English explanation
Then the angry Ravana seized Sita, seating her in his chariot.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| क्रोधवंत | क्रोध से भरा | filled with anger |
| तब | तब | then |
| रावन | रावण ने | Ravana |
| लीन्हिसि | सीता को ले लिया | seized Sita |
| रथ | रथ में | in the chariot |
| बैठाइ | बैठाकर | having seated her |
2 चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ।।28।।
वह आकाशमार्ग से चला; भय से इतना व्याकुल था कि रथ ठीक से हाँका नहीं जा रहा था।
English explanation
He departed through the sky, so agitated by fear that he could not properly drive the chariot.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चला | चल पड़ा | departed |
| गगनपथ | आकाश के मार्ग से | through the sky |
| आतुर | व्याकुल | agitated |
| भयँ | भय से | from fear |
| रथ | रथ | the chariot |
| हाँकि | हाँका | driven |
| न | नहीं | not |
| जाइ | जा सकता | could be |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 28
- स्रोत अभिलेख
- 3.28
- सहायक विषय
- मारीचप्रसंग और स्वर्ण-मृगरूपमें मारीचका मारा जाना · श्रीसीताहरण और श्रीसीता-विलाप
- मुद्रित पृष्ठ
- 656, 658
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