अरण्यकाण्ड · दोहा 27 · दोहा/सोरठा
बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ।
बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ।
निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ।।27।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 3.27 · पुस्तक पृ. 655, 656
भावार्थ और शब्दार्थ
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1बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ।
देवता बहुत से फूल बरसाते हैं और प्रभु के गुणों की गाथाएँ गाते हैं।
English explanation
The gods shower abundant flowers and sing accounts of the Lord’s virtues.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिपुल | बहुत से | abundant |
| सुमन | फूल | flowers |
| सुर | देवता | the gods |
| बरषहिं | बरसाते हैं | shower |
| गावहिं | गाते हैं | sing |
| प्रभु | प्रभु के | the Lord’s |
| गुन | गुणों की | virtues |
| गाथ | गाथाएँ | accounts; songs of praise |
2 निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ।।27।।
दीनों के बंधु रघुनाथ ने उस राक्षस को अपना परम पद प्रदान किया।
English explanation
Rama, friend of the lowly, granted the demon his own supreme abode.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निज | अपना | his own |
| पद | परम पद; दिव्य धाम | supreme state; divine abode |
| दीन्ह | दिया | granted |
| असुर | राक्षस मारीच | the demon Maricha |
| कहुँ | को | to |
| दीनबंधु | दीनों के मित्र और सहायक | friend and helper of the lowly |
| रघुनाथ | रघुकुल के स्वामी राम ने | Rama, lord of Raghu’s line |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 27
- स्रोत अभिलेख
- 3.27
- सहायक विषय
- मारीचप्रसंग और स्वर्ण-मृगरूपमें मारीचका मारा जाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 655, 656
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