अरण्यकाण्ड · दोहा 1 · दोहा/सोरठा
अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह।
मूल पाठ
अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह।
ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह।।1।।
स्रोत अभिलेख 3.1 · पुस्तक पृ. 620, 620
भावार्थ
मूल पाठ के बादश्रीरघुनाथजी, जो अत्यन्त ही कृपालु हैं और जिनका दीनोंपर सदा प्रेम रहता है, उनसे भी उस अवगुणोंके घर मूर्ख जयन्तने आकर छल किया॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 620 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह।
English explanation
Rama, leader of the Raghu lineage, is exceedingly compassionate and always loves the lowly and distressed.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| कृपाल | कृपालु | compassionate |
| रघुनायक | रघुवंश के नायक राम | Rama, leader of the Raghu lineage |
| सदा | सदा | always |
| दीन | दीनों, असहायों | the lowly and helpless |
| पर | पर, के प्रति | toward |
| नेह | स्नेह | love |
2 ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह।।1।।
English explanation
Yet that fool, an abode of faults, came and practiced deceit against that very Lord.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ता | उनके, उन्हीं राम के | that very Lord |
| सन | साथ, के प्रति | against |
| आइ | आकर | having come |
| कीन्ह | किया | committed |
| छलु | छल, धोखा | deceit |
| मूरख | मूर्ख ने | the fool |
| अवगुन | अवगुणों का | of faults |
| गेह | घर, आश्रय | an abode |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 1
- स्रोत अभिलेख
- 3.1
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 620
- सहायक विषय
- जयन्तकी कुटिलता और फलप्राप्ति
- मुद्रित पृष्ठ
- 620, 620
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।