अरण्यकाण्ड · छंद · छंद
कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे।
मूल पाठ
कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे।
अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे॥
सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए।
ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए॥
स्रोत अभिलेख 3.46 · पुस्तक पृ. 678, 679
भावार्थ
मूल पाठ के बाद'शेष और शारदा भी नहीं कह सकते यह सुनते ही नारदजीने श्रीरामजीके चरणकमल पकड़ लिये। दीनबन्धु कृपालु प्रभुने इस प्रकार अपने श्रीमुखसे अपने भक्तोंके गुण कहे। भगवान्के चरणोंमें बार-बार सिर नवाकर नारदजी ब्रह्मलोकको चले गये। तुलसीदासजी कहते हैं कि वे पुरुष धन्य हैं, जो सब आशा छोड़कर केवल श्रीहरिके रंगमें रँग गये हैं।
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 679 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे।
English explanation
AI-draft meaning: Hearing of qualities that even Saraswati and Shesha cannot describe, Narada clasped the Lord’s lotus feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहि | कह | describe |
| सक | सकते | can |
| न | नहीं | not |
| सारद | वाणी की देवी सरस्वती | Saraswati, goddess of speech |
| सेष | शेषनाग | Shesha, the divine serpent |
| नारद | देवर्षि नारद | Narada, the divine sage |
| सुनत | सुनकर | on hearing |
| पद | चरण | feet |
| पंकज | कमल | lotuses |
| गहे | पकड़ लिए | clasped |
2अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे॥
English explanation
Such a compassionate Lord, the friend of the helpless, spoke his devotee’s virtues with his own mouth.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अस | ऐसे | such |
| दीनबंधु | दीनों के बंधु प्रभु | the Lord, friend of the helpless |
| कृपाल | कृपालु | compassionate |
| अपने | अपने | his own |
| भगत | भक्त के | devotee’s |
| गुन | गुण | virtues |
| निज | अपने ही | his very own |
| मुख | मुख से | with his mouth |
| कहे | कहे | spoke |
3सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए।
English explanation
Bowing his head repeatedly at the Lord’s feet, Narada departed for Brahma’s realm.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सिरु | सिर | head |
| नाइ | नवाकर | having bowed |
| बारहिं | बार-बार | repeatedly |
| बार | बार | times |
| चरनन्हि | चरणों में | at the feet |
| ब्रह्मपुर | ब्रह्मा के लोक को | to Brahma’s realm |
| नारद | देवर्षि नारद | Narada, the divine sage |
| गए | चले गए | departed |
4ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए॥
English explanation
Tulsidas says: Blessed are those who abandon worldly expectations and are dyed in the color of love for Hari.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ते | वे | those |
| धन्य | धन्य | blessed |
| तुलसीदास | कवि तुलसीदास कहते हैं | the poet Tulsidas says |
| आस | सांसारिक आशाएँ | worldly expectations |
| बिहाइ | छोड़कर | having abandoned |
| जे | जो | who |
| हरि | भगवान हरि के | of Lord Hari |
| रँग | प्रेम के रंग में | in the color of love |
| रँए | रँगे हुए हैं | are dyed |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 3.46
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 679
- सहायक विषय
- संतोंके लक्षण और सत्संग-भजनके लिये प्रेरणा
- मुद्रित पृष्ठ
- 678, 679
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।